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पटना, नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर तीन ऐसी बातें कहीं जिनसे अंदाजा लगया जा सकता है कि एक और क्षत्रप भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रवैये को 'गठबंधन धर्म' के लिए ठीक नहीं मान रहा है.

जहां एक तरफ अमित शाह और पीएम मोदी की पूरी टीम चार साल की उपलब्धियां गिना रही थीं, वहीं नीतीश कुमार ने पटना में बैंकर्स को संबोधित करते हुए चौंका दिया. उन्होंने पहली बार नोटबंदी पर प्रहार किया. ये वही नीतीश कुमार हैं जिन्होंने महागठबंधन में रहते हुए भी नोटबंदी के फैसले को सही ठहराया था. आज एनडीए में भाजपा के मजबूत साथी माने जाते हैं. ऐसे में उनका पलटना बहुत कुछ कहता है.

नीतीश यहीं नहीं रूके. उन्होंने नीरव मोदी, विजय माल्या जैसे भगोड़े कारोबारियों का नाम लिए बिना बैंकिंग प्रणाली पर जम कर प्रहार किया. नीतीश ने इस पर भी आश्चर्य जताया कि कैसे हजारों करोड़ के घपले की जानकारी ' हाई लेवल तक को नहीं लगी '. नीतीश राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं. उन्हें पता होगा कि ये बयान मोदी विरोधियों का नया हथियार बनेगा. लेकिन वो एक संदेश साफगोई से देना चाहते थे जो उन्होंने दिया. और ठीक उसके बाद बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने तंज कसते हुए कहा कि 'चाचा नीतीश को बहुत देर से ज्ञान प्राप्त हुआ'.

इसके बाद पत्रकारों ने घेर कर नीतीश से पूछा कि नरेंद्र मोदी के चार साल पर क्या कहेंगे तो वो टाल गए और पीछे की ओर इशारा करते हुए कहा, 'मेरी तरफ से जवाब सुशील जी (सुशील मोदी) देंगे'. इससे साफ पता चला कि वो तारीफ में कसीदे गढ़ने की बजाय बचना चाह रहे हैं. भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील मोदी क्या बोलेंगे ये एक आम आदमी को भी पता है. 

हालांकि गठबंधन धर्म निभाते हुए उन्होंने मोदी के चार साल पर एक ट्वीट जरूर किया. लेकिन 24 घंटों के भीतर ट्वीट तीसरा ऐसा मौका था जिससे नीतीश के मिजाज का संकेत मिलता है. नीतीश ने अपने ट्वीट कहा, 'मैं उम्मीद करता हूं कि केंद्र सरकार जनता की उम्मीदों पर खरा उतरेगी.' ये हैरान करने वाला ट्वीट है. इसमें उपलब्धियां गिनाने के बदले नीतीश ने ये संदेश देना ज्यादा मुनासिब समझा कि बचे हुए एक साल में काम भी काफी बचे हुए हैं.

तो क्या नीतीश का मन बदला रहा है? ऐसा नहीं है बशर्ते भाजपा खुद इसके लिए जमीन तैयार न करे. ये कहना था नीतीश कुमार के एक बेहद करीबी नेता का जिसकी पैठ भाजपा के शीर्ष नेताओं में भी गहरी है. वो कहते हैं, "नीतीश भाजपा के साथ आने से पहले नरेंद्र मोदी के समानांतर खड़े थे और विपक्ष उन्हें पीएम उम्मीदवार बना सकता था. इसके बावजूद नीतीश ने भ्रष्टाचार में डूबी राजद और कांग्रेस को छोड़ भाजपा से हाथ मिला कर खुद को बिहार तक ही सीमित कर लिया. पर इसका मतलब ये नहीं है कि भाजपा अपनी शर्तों पर नीतीश सरकार चलाए."

इससे पहले रामनवमी के मौके पर सांप्रदायिक तनाव के दौरान भी भाजपा नेताओं ने नीतीश पर जम कर भड़ास निकाली थी. जब पीएम मोदी पटना आए तो नीतीश के हाथ जोड़ कर विनती करने के बावजूद पटना यूनिवर्सिटी को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा देने की मांग नहीं मानी. सार्वजनिक मंचों से इस तरह की फजीहत की उम्मीद नीतीश जैसा कद्दावर नेता कभी नहीं कर सकता.

अब जब बिहार में भाजपा के साथ बनी सरकार पहली वर्षगांठ मनाने की तैयारी कर रही है और केंद्र की सरकार कार्यकाल के अंतिम साल में प्रवेश कर गई है, नीतीश कुछ हिसाब-किताब के मूड में हैं. पीएम मोदी अपने भाषणों में कहा करते थे कि अगर पटना और दिल्ली में एक ही गठबंधन की सरकार बन जाए तो विकास में डबल इंजन लग जाएगा. ये डबल इंजन पहले विपक्ष को दिखाई नहीं दे रहा था, अब नीतीश को भी.

नीतीश कुमार चाहते हैं कि मोदी सरकार डबल इंजन के वादे को निभाए. विशेष राज्य का दर्जा एक बड़ा मुद्दा है. नीतीश अब इस पर जोर दे रहे हैं. हर मंच से नीतीश और उनकी पार्टी के नेता इस मुद्दे को उठा रहे हैं. बैंकों के रवैये पर नीतीश शुरू से उंगली उठाते आए हैं. बिहार में क्रेडिट-डिपोजिट अनुपात महज 38 प्रतिशत है. नीतीश बार-बार नाराजगी जताते आए हैं कि बैंक बिहार में लोन क्यों नहीं देना चाहते. उन्होंने यहां तक आरोप लगाया है कि बिहार के लोगों के जमा पैसे का इस्तेमाल दूसरे राज्यों में लोन देने के लिए हो रहा है.

विकास के मुद्दे के अलावा राजनैतिक फलक पर भी नीतीश बिहार में सम्मानजक स्थान चाहते हैं. शिव सेना की बगावत और चंद्रबाबू नायडू के एनडीए छोड़ने के बाद जेडीयू ने भी पॉलिटिकल वैल्यू का अहसास कराने की ठानी है. नीतीश के हालिया बयान इसी की तस्दीक करते हैं.

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