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भूषण पालकी में बैठते तो पहला कंधा खुद महाराज छत्रसाल लगाते…

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का लेकर कल यानी तीन मई को दिल्ली में जो हुआ, वह बहुत अच्छा तो नहीं ही कहा जा सकता. और जिस वजह से हुआ उसके बारे में भी क्या कहा जाए. लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि जब किसी का सम्मान किया जाता है तो उसके पीछे सम्मान की भावना होनी भी चाहिए और सम्मान पाने वाले को महसूस भी होनी चाहिए.

कल जो वाकया हुआ उसकी चर्चा बाद में करेंगे. पहले जरा यह देखें कि कलाकारों को सम्मानित करने का हमारे मुल्क में और दुनियाभर में कैसा चलन रहा है. इसमें सबसे मशहूर किस्सा 17वीं शताब्दी से याद आता है. उस जमाने में मशहूर कवि हुआ करते थे भूषण. इस महाकवि को महाराज छत्रपति शिवाजी और महाराज छत्रसाल दोनों के साथ रहने का मौका मिला. शिवाजी पर उनकी किताब शिवा बावनी और महाराज छत्रसाल पर उनकी किताब छत्रसाल दशक अपने समय की बहुत बड़ी रचनाएं रहीं. जाहिर है दोनों राजा अपने प्रिय कवि का सम्मान भी बहुत करते थे. कहा जाता है कि जब भूषण पालकी में बैठते थे तो उसमें सबसे पहला कंधा खुद महाराज छत्रसाल लगाते थे. उसके बाद कहार पालकी को उठाते थे. यानी इस मुल्क में छत्रसाल जैसा राजा जिसने मुगल साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील ठोकी, वह भी कला को अपने कंधे पर उठाता, सर माथे रखता था.

दूसरी कहानी दुनिया की सबसे लंबी कविता शाहनामा के कवि फिरदौसी की है. इससे अंदाजा लगता है कि कलाकार कितना नाजुक मिजाज और कैसा तुनक मिजाज होता है. कहा जाता है कि फिरदौसी की कविता से खुश होकर महमूद गजनवी ने उनसे कहा कि आपकी हर कविता पर एक सोने की अशर्फी दी जाएगी. कवि ठहरा अपने भाव में रहने वाला आदमी, उसे लगा कि रोज-रोज मुद्राओं का हिसाब कौन रखे. उन्होंने कह दिया कि अभी रहने दीजिये, जब कविता पूरी हो जाएगी तो एक मुश्त दे दीजिएगा.

उसके बाद फिरदौसी 30 साल तक शाहनामा लिखते रहे. जब अपनी साठ हजार कविताओं के साथ शाहनामा पूरा हुआ तो वादे के मुताबिक महमूद ने साठ हजार सोने की अशर्फियां कवि को देने का आदेश दिया. लेकिन जिस अफसर को यह काम सौंपा गया, वह कुछ ज्यादा ही सयाना था. उसने सोने की जगह चांदी की अशर्फियां कवि को पठा दीं. जब इनाम की रकम कवि के पास पहुंची, उस समय वह गुसलखाने में थे. उन्हें चांदी की बात पता चली तो उन्होंने वे अशर्फियां अफसर के सामने ही अपने नौकरों में बांट दीं. अपने जमाने के सबसे मजबूत बादशाह को जब इनाम की इस तौहीन का पता चला तो वह बिफर पड़ा. फिरदौसी शहर छोड़कर भाग गए. वर्षों बाद महमूद को पता चला कि कवि के साथ धोखा हुआ था, तो उसे बड़ा मलाल हुआ. एक बार फिर ईरान के तुस (Tus) शहर में फिरदौसी के लिए सोने की साठ हजार मुद्राएं भेजी गईं. लेकिन जब शाही कारवां शहर पहुंचा तो सामने से शायर का जनाजा चला आ रहा था.

यानी कवि मरते मर गया, लेकिन उसने बादशाह की चिरौरी नहीं की. ये तो महज दो किस्से हुए, हमारा और दुनियाभर का इतिहास इस बात से पटा पड़ा है कि कलाकारों के दिल बहुत नाजुक होते हैं. उनकी प्रतिभा अगर नई समष्टि रच सकती है तो जरा सी बेअदबी पर बिखर भी सकती है. अपने अपने समय में हर बड़े से बड़े बादशाह ने इस बात का सम्मान किया है. अकबर बीरबल के किस्सों में हर बार बादशाह अकबर को बीरबल से इसीलिए तो हराया जाता है ताकि समाज में संदेश जाए की विलक्षण प्रतिभाओं को राजा के प्रोटोकॉल से छूट हासिल है. और 1936 के बर्लिन ओलंपिक का किस्सा तो हर भारतीय जानता ही है जब 20वीं सदी के सबसे खतरनाक और ताकतवर आदमी एडोल्फ हिटलर ने खड़े होकर एक गुलाम देश के खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद का इस्तकबाल किया था.

यानी बड़ा वह है, जो कलाओं और प्रतिभाओं के सामने झुक जाए. फिल्म पुरस्कार समारोह में मुख्य भूमिका निभाने वाली सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी खुद भी प्रतिष्ठित अभिनेत्री रही हैं. कलाकारों के स्वभाव को उनसे ज्यादा दूसरा कौन जा सकता है. दूसरी तरह उनके जूनियर मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर भी ओलंपिक मेडलिस्ट हैं और उन्हें भी यह बताने की जरूरत नहीं कि प्रतिभाओं के जगत में कितनी छोटी सी बात भी प्रतिभा का मूड उखाड़ सकती है.

ऐसे में बेहतर होता कि महामहिम से थोड़ा और वक्त देने की मनुहार समय रहते कर ली जाती. थोड़ा समय खर्च होता और दर्जनों कलाकारों का मन और मान दोनों रह जाता. इनका मान रह जाता तो भारत के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित फिल्म पुरस्कारों को इस अप्रिय मंजर से न गुजरना पड़ता.

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