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#HumanStory: 'मैदान-ए-जंग में रहने जैसा है कश्मीर में रहना'

Mridulika Jha

हकीकत में ऐसी होती है एक आम कश्मीरी की जिंदगी...

वादियों, झरनों, झीलों और रंगदार सेबों के लिए सैलानियों को पुकारते कश्मीर की हकीकत कुछ और भी है. शोपियां के बाशिंदे माजिद मोहम्मद (नाम बदला हुआ) कहते हैं, 'खबरों के जरिए कश्मीर को जानने वाले असल में जानते ही नहीं कि कश्मीर में रहना क्या होता है'.

पत्रकारिता में एक अरसा हुआ. कई कश्मीरी दोस्त बने. बावजूद इसके जब भी देश के इस हिस्से का जिक्र आया, जहन में चीड़ के पेड़, डल झील और कहवा की खुशबू तैरने लगती. तभी तो जब माजिद ने कहा, हमारे घर जंग के मैदान में हैं, मैं यकबयक अपने हिस्से के तर्क खंगालने लगी. वे तब तक कहना शुरू कर चुके थे.

घर...पुलिस स्टेशन, कब्रिस्तान और अस्पताल

घर से तकरीबन 20 फीट की दूरी पर एक ऊंची दीवार है. ये पुलिस स्टेशन की दीवार है, जहां तीन बंकर हैं. बच्चे बाहर निकलते हैं तो जो पहली चीज देखते हैं, वो है बंकर और पुलिसिया वर्दी. कुछ रोज पहले पासपोर्ट वैरिफिकेशन के लिए गया तो सीसीटीवी पर 'अपना' घर देखा. हम अनचाहे ही 24/7 सर्विलांस पर हैं. इतना ही काफी नहीं. घर के पास एक कब्रिस्तान है जिसमें मिलिटेंट दफनाए जाते हैं. और- एक पार्क है, जो कब्रिस्तान की शक्ल अख्तियार कर चुका है. मकान के दूसरी तरफ एक गली अस्पताल को जाती है

मेरा मकान और गली गवाह हैं, हादसों के. उन चीखों के जिन्हें दहशतंगेजी का अंधेरा लील लेते हैं.

कश्मीरी कभी प्लान नहीं करते
38 साल के माजिद की जिंदगी शोपियां के मेन टाउन में बीती. वे दवा के बिजनेस से जुड़े हैं. कुछ उर्दू अखबारों के लिए लिखते भी हैं. उनके दिन की शुरुआत होती है टीवी पर लोकल खबरें देखने से. कहते हैं, ‘ऐसा मैं मीडिया से जुड़ा होने की वजह से नहीं करता. ये हर आम कश्मीरी के रुटीन का हिस्सा है. नमाज के तुरंत बाद यानी सुबह 5 बजे टीवी खोलता हूं- कहीं कोई फायरिंग, हड़ताल या कर्फ्यू तो नहीं. इसी के हिसाब से तय होता कि बच्चे स्कूल जाएंगे या नहीं. बड़े दफ्तर जाएंगे कि नहीं. शादी-ब्याह में शिरकत की जा सकती है या फिर फोन पर मुआफी मांगनी होगी. बहुत बार फोन भी बंद हो जाते हैं.

तब टीवी देखते हुए हालात सुधरने की दुआ करना ही एक रास्ता बचता है. इंटरनेट हमारे लिए 'लग्जरी' है, लिहाजा इसका बंद होना कश्मीरियों को सिरदर्द नहीं देता.’

फिर जब हिंदू टीचर गायब होने लगे
कुछ नजारे हमारे यहां बेहद आम हैं. मसलन, यहां रोज सुबह स्कूल बस के स्टॉप पर बच्चों से ठीक दोगुनी संख्या पेरेंट्स की होती है. हर बच्चे के साथ उसके मां-बाप दोनों होते हैं. मिलिटेंट, नकाबपोश गनमैन से लेकर जाने कितने कोने-कंगूरे होंगे, जहां से गोली आ सकती है. कहीं भी ब्लास्ट हो जाता है.

क्या ऐसे हालात हमेशा से थे? 

नहीं. माजिद याद करते हैं- पहले तो नहीं. हमने साल 1989 में इसकी आहट सुनी. मैं हाईस्कूल में था. टीचर एकाएक गायब होने लगे. सारे हिंदू टीचर. सब कश्मीरी पंडित. तभी जाना कि पढ़ाने वालों का भी जाति-धर्म होता है.

तबसे पहले नहीं पता था कि गोली से मरना क्या होता है. हम कश्मीरियों ने कुदरती मौतें ही देखी थीं. एकाएक सब तबाह हो गया. 

उस मौत का मातम जिंदगी पर भारी है
पहली बार मौत को करीब से जाना, जब छापामारी के दौरान एक दोस्त को मार दिया गया. हम साथ पढ़ते थे. छुट्टियों में मैं उसे अपने घर ले जाना चाहता था. शायद वो बच जाता अगर मैं उसे अपने साथ घसीट ले जाता. शायद मेरी कमजोर जिद ने उसकी जान ले ली. आज भी रातों में उसका चेहरा मुझे याद आ जाता है. इसके बाद तो जैसे सिलसिला चल निकला. अब कोई कश्मीरी नहीं, जिसने अपने किसी करीबी को आंखों के सामने दम तोड़ते न देखा हो.

जन्नत को जहन्नुम की शक्ल क्योंकर मिली!
माजिद का मानना है कि दहशतगर्दी को लेकर कश्मीरी अवाम दो धड़ों में बंट गई है. आवाज में लाचारगी के साथ बताते हैं, रात को कौन आता है. लोगों को मारकर क्यों जाता है ये अभी तक समझ नहीं आया. अगर मैं प्रो-पाकिस्तान या प्रो-इंडिपेंडेंस हूं तो सोचूंगा कि इंडियन एजेंसी का काम है, प्रो-इंडिया हूं तो इसे मिलिटेंट का काम समझूंगा. हम आपस में ही तबाह हो जाएंगे.

मेरे बचपन में हालात एकदम उलट थे.

पड़ोस में 'एक' मोहन लाल हुआ करते. उनकी किराने की दुकान थी. किसी काम से बाहर जाते तो मैं उनके गल्ले पर बैठता. हमारे घरों में जब भी कुछ अच्छा पकता, छतों से अदला-बदली होती. औरतें दोपहर साथ बितातीं तो मर्द शामें.

मुझे रामायण किसी धुर-हिंदू जितनी ही याद है. 

वजह! हमारे मोहल्ले में एक ही घर में टीवी था. वो हिंदू घर था. दूसरे प्रोग्राम हम भले छोड़ दें लेकिन रामायण देखने के लिए पूरे का पूरा मोहल्ला उमड़ जाता था. पड़ोसी गांव में एक बुजुर्ग की जियारत है. वहां मेरी अम्मी भी जातीं और पड़ोस के हिंदू घरों की मौसियां भी. अफसोस! वो कश्मीरी तहजीब हमारे बच्चे देख नहीं सकेंगे.

बेटियों को मेरा बचपन कोई कहानी लगता है
दो बेटियों का पिता हूं. खेल-खेल में अक्सर अपने बचपन की बातें कहता हूं. वे मुंह फाड़े सुनती हैं. बात खत्म हो जाए लेकिन हैरत आंखों में फैली रहती है. मेरे बचपन के किस्से उन्हें ‘फिक्शन’ लगते हैं. इससे बड़ी तकलीफ क्या होगी! वे मिलिटेंट देखती हैं, आर्मी देखती हैं. पुलिस देखती हैं. गोलियों की आवाजें सुनती हैं. चीखों से वाकिफियत है. कल ही की बात लें. रात में पास के कुछ लड़के पटाखे जला रहे थे. छोटी बेटी नींद से जाग गई और कहा, अब्बू, फायर हो रहा है.

कश्मीरी बच्चों के लिए आतिशबाजी और धमाकों में कोई फर्क नहीं रहा. ये हर कश्मीरी बाप का दर्द है.

हालात इतने खराब हैं कि घरों के आंगन खत्म होते- न होते बंकरों की जद शुरू हो जाती है. एक पड़ोसी के आंगन में खूब बढ़िया अखरोट का पेड़ है. एक शाम पेड़ से अखरोट बंकर की छत पर गिरे. टपाक की आवाज के साथ ही पुलिस मुस्तैद हो गई. एक छोटी टुकड़ी आई और सबको धमकाया. अगर दोबारा पत्थरबाजी हुई तो अंजाम ठीक नहीं होगा. सैलानी यहां आते हैं, चाव से कागजी अखरोट ले जाते हैं. यहां हम अपने पेड़ों से घबराने लगे हैं. जानें कब, कौन सा अखरोट पत्थर की शक्ल ले ले. और हम आतंकी का.

बुरहान के बाद महीनों स्कूल में ताला पड़ा रहा और दफ्तर बंद
शांत इलाकों के बाशिंदों की तरह हमने कभी 'वीकेंड' नहीं जाना. इस लफ्ज से हमारी पहचान केवल पढ़ने-सुनने की रही. साल के 365 दिनों को आधा-आधा बांट दीजिए. आधे साल कश्मीरी अवाम घर बैठ सलामती की दुआएं मांगती है और बाकी आधा साल काम खत्म करने में जुटी रहती है. पोस्ट-बुरहान बच्चों के स्कूल बंद हो गए. हमने कम्युनिटी स्कूल बनाए. बच्चों को खुद पढ़ाते. सालभर का कोर्स पूरा होने में दो साल न लगें तो वो यहां के लोगों के लिए हैरत की बात होगी. ऐसे में वीकेंड पर, छुट्टियों में स्कूल खुले रहते हैं. दफ्तर चालू रहते हैं.

महीनों पहले मैंने बेटियों से वादा किया था कि उन्हें घाटी में चलने वाली ट्रेन में बैठाऊंगा. बारामूला से अनंतनाग तक घूमेंगे. 

कितना मामूली वादा! कितनी मामूली ख्वाहिश! मैं अब तक वो वादा भी पूरा न कर सका. बेटियां भी अब ऐसी कोई ख्वाहिश नहीं करतीं. करती भी हों तो जताती नहीं.

किश्तों में हुई इस तमाम बातचीत के दौरान कितनी ही बार फोन कटा. कितनी ही बार आवाज टूटी. आखिर में कुछ हड़बड़ाते हुए ही माजिद ने फोन रखा, ये बताकर कि घर से लगातार फोन आ रहा है.

कश्मीरी, फिर चाहे वो हिंदू हों या मुस्लिम, कभी गपशप के लिए फोन नहीं करते. अक्सर इसका ताल्लुक 'जिंदगियों' से होता है.  

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