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दुश्मन को परास्त करने के लिए उसकी ताकत और कमजोरी को चिन्हित करना पहली शर्त है. कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल चार साल बाद भी अंधेरे में तीर चला रहे हैं. इन दलों समेत मोदी विरोधियों का पूर्वाग्राह है कि प्रधानमंत्री अब लोकप्रिय नहीं हैं या लोकप्रियता घटती जा रही है. यही कारण है कि शायद भारतीय चुनावी इतिहास में पहली बार गुजरात में मिली हार को विपक्ष ने सेलिब्रेट किया.

इस हार के बाद नरेंद्र मोदी पर हमले और तेज हुए. हमलावर भूल गए कि वो दुश्मन की कमजोरी के बदले उसके मजबूत पहलू पर वार कर रहे हैं. ये विपक्ष और खास कर राहुल गांधी के लिए खतरे की घंटी है. 90 के दशक में लालू यादव को याद कीजिए. कई जनसंहार हुए. जातीय उन्माद चरम पर था. पटना हाई कोर्ट ने बिगड़ती विधि व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए लालू प्रसाद के शासन की तुलना जंगलराज से की.

विपक्ष उत्साहित था. 1995 में ऐसा समां बंधा जैसे लालू का राजनीतिक अंत करीब है. लेकिन सच्चाई बिल्कुल उलट थी. लालू की लोकप्रियता बरकरार थी. शहरी मध्य वर्ग के इतर गांवों के गरीब गुरबे को वोट डालने के जिस अधिकार से लालू ने लैस किया, उसने उन्हें गरीबों का मसीहा बना दिया. जातीय वर्चस्व को ध्वस्त करते हुए लालू दलितों-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के हीरो के तौर पर उभर चुके थे.


लालू को इसके लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. ये सब 1990 में उनके सीएम बनने से लेकर 1994 के बीच हो चुका था. बंद होते कल कारखाने, चीनी मिल और जर्जर सड़कें लालू के लिए कोई मतलब नहीं रखते थे. सामाजिक सशक्तिकरण ऐसा औजार था, जिसके आगे आर्थिक सशक्तिकरण और विकास वोट पाने के लिए ज़रूरी नहीं था.

जब 1995 में विधानसभा का चुनाव नजदीक आया तो लालू के खिलाफ मोर्चेबंदी हो चुकी थी. नीतीश कुमार भी समता पार्टी बनाकर मैदान में थे. माहौल लालू के खिलाफ था. लेकिन जनादेश लालू के साथ. चुनाव परिणाम चौंकाने वाले आए. लालू 90 से ज्यादा सीटें पाकर दोबारा सीएम की कुर्सी पर काबिज हो गए. चारा घोटाले में कुर्सी छिनने के बाद भी लालू ने 2000 का चुनाव जीता. हार तभी हुई जब सामाजिक न्याय का नारा कुंद पड़ने लगा और जिस तबके में वो लोकप्रिय थे, उसने महसूस किया कि सामाजिक सशक्तिकरण के बाद विकास जरूरी है. जिसका खाका लालू नहीं खींच पाए.

कमोबेश पिछले चार वर्षों में पीएम मोदी ने भी ऐसी ही लोकप्रियता हासिल की है. लालू से मोदी की तुलना बेमानी है पर राजनीतिक तरीकों पर गौर किया जाए तो प्रधानमंत्री ने गरीबों में पैठ आर्थिक सशक्तिकरण की मुहिम चला कर बनाई है. 'गरीबी हटाओ' एक बार फिर केंद्र सरकार को फोकस में है. पिछले चार वर्षों में मोदी के कारण भाजपा का मध्यवर्गीय ‘बनिया’ पार्टी वाला चरित्र भी बदला है. यूपी और अब कर्नाटक के चुनाव परिणामों से यही पता चलता है. कभी बंगलौर जैसे महनागर भाजपा का गढ़ माने जाते थे, लेकिन इस परिणाम संकेत कर रहे हैं कि भाजपा ने शहरों से गांव की ओर रूख कर लिया है. इस साल के बजट से भी नरेंद्र मोदी ने यही जताया. गांव और खेती पर ज्यादा फोकस रहा. इनकम टैक्स में कोई बदलाव न करना एक राजनीतिक संदेश भी था कि गांव और गरीब सरकार की पहली प्राथमिकता है.

लालू की तरह जब-जब नरेंद्र मोदी पर हमला हुआ उन्होंने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि और संघर्ष की कहानी दोहराई. ये ऐसी चीज है जो गरीबों को मोदी से सीधे कनेक्ट करती है. एक चाय बेचने वाले का पीएम पद पर पहुंचना भले ही किसी चाय दुकानदार के लिए सीधे तौर पर फायदेमंद न हो लेकिन वह मोदी की तरह ही गौरवान्वित महसूस करता है.


ऐसी स्थिति में विपक्ष और खास कर कांग्रेस को अपनी रणनीति बदलनी होगी. वो मोदी पर जितना हमला करेंगे, उतना ही अपना नुकसान करेंगे. लोकप्रियता कुंद करने के लिए कमियों पर प्रहार करना जरूरी है. लोकप्रिय जननेता पर नहीं. केंद्र में मोदी के अलावा राज्यों में ऐसे कई सीएम हैं जिनकी लोकप्रियता कायम है. समकालीन राजनीति को देखें तो उड़ीसा में नवीन पटनायक, मध्य प्रदेश में शिवराज, छत्तीसगढ़ में रमण सिंह और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं. ​



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