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भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ गठबंधन की बात करें तो उत्तर प्रदेश की विपक्षी सियासत इस समय काफी जोर मार रही है. यूपी के दो प्रमुख दल समाजवादी पार्टी और बसपा एक साथ आने का ऐलान कर चुके हैं. लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि पहली बार ऐसा देखने को मिल रहा है कि यूपी में ज्यादा जनाधार वाली समाजवादी पार्टी गठबंधन में 'जूनियर पार्टनर' की भूमिका में नजर आ रही है. ऐसे कई मौके हैं, जब सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव तजुर्बे के मामले में बसपा से थोड़ा कम साबित हुए. यही नहीं उन्हें गलती सुधारनी भी पड़ी.

वहीं दूसरी तरफ पिछले तीन चुनावों में हाशिए पर जा चुकी बसपा अब गठबंधन के सहारे लगातार सधे हुए कदमों से दिन पर दिन आगे बढ़ती दिख रही है. राज्यसभा चुनाव हो या बंगला खाली करने का मसला दोनों ही जगह अखिलेश चूकते नजर आए, जबकि मायावती ने यहां अनुभव का प्रदर्शन किया.

जब राज्यसभा चुनाव में 'चूक' गए अखिलेश

राज्यसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी भीमराव अंबेडकर की हार के बाद बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि चुनाव में भले ही हमारी हार हुई हो लेकिन समाजवादी पार्टी की ओर से कोई गलती नहीं हुई. उन्होंने ये जरूर कहा कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव में तजुर्बे की कमी है. अखिलेश यादव को भी लगा कि उनसे गलती हुई है. इसकी भरपाई अखिलेश ने विधानपरिषद चुनाव में की. यहां उन्होंने बसपा प्रत्याशी भीमराव अंबेडकर को जीत दिला दी.

सरकारी बंगले को लेकर भी विवादों में आए अखिलेश

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले खाली करने का फरमान आया. तय हो गया कि बंगला तो किसी भी हालत में खाली करना ही होगा. यहां भी मायावती ने सभी को चौंकाते हुए किसी भी विवाद से बचते हुए बंगला खाली किया. उन्होंने बंगले पर कांशीराम विश्राम स्थल का बोर्ड लगा दिया. यही नहीं बंगला खाली करते समय मायावती ने मीडिया को बुलाकर पूरा बंगला दिखाया. मामले में अब राज्य संपत्ति विभाग कुछ भी बोलने से बच रहा है.

दूसरी तरफ अखिलेश यादव ने भी सरकारी बंगला खाली जरूर किया लेकिन विवाद से बच नहीं सके. पहले अखिलेश यादव ने सिक्योरिटी की बात कह दो साल का समय बंगला खाली करने के लिए मांगा. इसके बाद उनके बंगला खाली करने के बाद राज्य संपत्ति विभाग ने बताया कि सिर्फ अखिलेश यादव के बंगले में तोड़फोड़ की गई और क्षतिग्रस्त किया गया. इस मामले में राज्यपाल ने भी सीएम से पूरे मामले में जांच को चिट्ठी लिख दी. वहीं बुधवार को अखिलेश यादव ने बंगले पर सफाई भी दी कि उनकी जो चीजें थीं, वो ले गए हैं. मामले में सियासी बयानबाजी जारी है.

गठबंधन में जूनियर पार्टनर नजर आ रही सपा!

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बावजूद समाजवादी पार्टी यूपी में करीब 24 प्रतिशत वोट बैंक हासिल करने में कामयाब रही. प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में सपा हमेशा से ही बसपा से आगे रही है. मौजूदा समय में भी सपा के पास 7 सांसद हैं, जबकि बसपा इस समय शून्य पर है. बावजूद इसके समाजवादी पार्टी गठबंधन में जूनियर पार्टनर की भूमिका में नजर आ रही है. खुद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहते हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद भी बसपा के साथ उनकी पार्टी का गठबंधन किसी भी शर्त पर जारी रहेगा. मैनपुरी में अखिलेश ने कहा कि अगर गठबंधन के लिए सीट बंटवारे में त्याग भी करना पड़े तो वह उसके लिए तैयार हैं. अखिलेश के अनुसार यह लड़ाई लंबी है. हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि बीजेपी की हार तय हो. जरूरत पड़ी तो समाजवादी लोग त्याग करने में पीछे नहीं हटेंगे.

गठबंधन से मिलती रही है बसपा को 'ताकत'

वैसे इतिहास गवाह है कि गठबंधन की राजनीति बहुजन समाज पार्टी को हमेशा से ही भाती रही है. बसपा ने गठबंधन बहुत किए और सरकार भी बनाई लेकिन हमेशा अपनी शर्तों पर ही दूसरे पक्ष को झुकाया. चाहे वह समाजवादी पार्टी से पहली बार यूपी में हुआ गठबंधन हो या उसके बाद बीजेपी के साथ गठबंधन की सरकार. हर बार मायावती ने अपनी सियासत से दूसरे साथी को धराशायी कर दिया. 1995 में गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती बीजेपी के समर्थन ने पहली महिला दलित मुख्यमंत्री बनीं. इसके बाद 1997 में भी वह 6 महीने तक मुख्यमंत्री रहीं लेकिन जैसे ही कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री बनने की बारी आई. एक महीने में ही उन्होंने समर्थन वापस ले लिया. इसके बाद फिर वह 2002 में मुख्यमंत्री बनीं.

बाद में विधानसभा चुनावों में बसपा भले ही सरकार नहीं बना पाई लेकिन जनाधार उसका बढ़ता ही गया. यही कारण था कि 2007 में बसपा ने यूपी में पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली. लेकिन इसके बाद 2012 में विधानसभा चुनाव और 2014 में लोकसभा चुनाव में उन्हें बुरी हार झेलनी पड़ी. वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में भी बसपा सीट ज्यादा हासिल नहीं कर सकी.



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