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समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने गठबंधन को लेकर करीबी लोगों से बातचीत में एक बार कहा था, 'गठबंधन में एक सीट छोड़ना अंगुली काटने जैसा है.' अब उनके बेटे अखिलेश सपा अध्‍यक्ष के रूप में सहायक भूमिका निभाने और शत्रु से दोस्‍त बनी बसपा के लिए सीटों की कुर्बानी देने को तैयार हैं. बता दें कि दोनों पार्टियां 2019 के चुनावों को लेकर समझौते को आखिरी रूप दे रही है. अखिलेश ने रविवार को एक रैली में कहा, 'हम बसपा के साथ गठबंधन को लेकर संकल्पित हैं और उनके साथ काम करते रहेंगे, फिर चाहे 2-4 सीटें छोड़नी पड़ें. हम रुकने वाले नहीं हैं. हम बीजेपी को हराएंगे.'

सूत्रों ने बताया कि गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा उपचुनावों में मिली जीत ने प्रस्‍तावित महागठबंधन में काफी कठिन तोलमोल को हवा दे दी है. कैराना सीट के नतीजे के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती की सुनियोजित चुप्‍पी ने सपा में कईयों की नींद उड़ा रखी है. किसी को नहीं पता कि 'बहनजी' का अगला कदम क्‍या होगा. बसपा की ओर से 26 मई को जारी की गई प्रेस रिलीज में कहा गया था कि यदि प्रस्‍ताव सम्‍मानजनक रहा तो गठबंधन किया जाएगा. इसके बाद से मायावती चुप हैं और इससे संभावित साथी परेशान हैं.

सपा और बसपा के बीच प्रतिद्वंद्विता की एक वजह कांग्रेस भी है. बसपा के वरिष्‍ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'जमीन पर मौजूद लोग विशेष तौर पर मतदाता गठबंधन के पक्ष में हैं. केवल नेता ही हैं जो अपने एजेंडे के तहत आगे बढ़ रहे हैं. जहां तक हमारी नेता मायावती की बात हैं तो वह 2019 के चुनावों को लेकर सोच रही हैं. वहीं अखिलेश की राजनीति 2022 के यूपी चुनावों के लिए है.'

नेताओं की अलग-अलग रणनीति की वजह से मायावती कांग्रेस को खुश रखना चाहती हैं. कांग्रेस के जरिए बसपा मध्‍य प्रदेश, छत्‍तीसगढ़, कर्नाटक, पंजाब और राजस्‍थान जैसे राज्‍यों में कुछ सीटें जीतने की उम्‍मीद कर सकती है. इन राज्‍यों के कुछ इलाकों में बसपा की पकड़ है. कांग्रेस के लिए भी बसपा की दोस्‍ती उसी तरह से कारगर है. मायावती की दलितों में पकड़ से कांग्रेस उम्‍मीद कर रही है कि उसे कई राज्‍यों में मजबूत दलित वोट मिल जाएंगे.

उत्‍तर प्रदेश से विधायक एक वरिष्‍ठ कांग्रेस नेता ने बताया, 'बसपा से गठबंधन उत्‍तर प्रदेश की सीमाओं से आगे बढ़ेगा. इससे दोनों को फायदा होगा. इस तरह का गठबंधन उत्‍तर प्रदेश में दलितों और अल्‍पसंख्‍यकों के लिए सबसे बड़ा चुंबक साबित होगा.' इससे साफ है कि मायावती 2019 के नतीजों के बाद राष्‍ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका पर नजरें गड़ाए हुए हैं

खंडित जनादेश में काफी कुछ हो सकता है और ऐसी स्थिति में लोकसभा में ठीकठाक सीटें और कांग्रेस से दोस्‍ती मायावती के पक्ष में जा सकती है. हालांकि अखिलेश के लिए 2019 राष्‍ट्रीय राजनीति में बड़ी महत्‍वाकांक्षा के लिए नहीं है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनके लिए बड़ी चुनौती 2022 के विधानसभा चुनाव और मुख्‍यमंत्री पद की दौड़ है. इस लक्ष्‍य के साथ अखिलेश को 2019 में कांग्रेस साथ आए या न आए कोई फर्क नहीं पड़ता.

सपा के वरिष्‍ठ नेता ने बताया, '2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ ह‍मारा अनुभव सही नहीं रहा. हमारे लिए यह गठबंधन नुकसानदायक रहा. सच कहा जाए तो 2019 में हमें उत्तर प्रदेश में बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस की जरूरत नहीं है. सपा-बसपा का गठबंधन यह काम कर सकता है.'

अखिलेश के सीटों की कुर्बानी वाले बयान पर उन्‍होंने जवाब दिया, 'अखिलेश इस गठबंधन के आर्किटेक्‍ट हैं और इसके नाते हम बलिदान के लिए भी तैयार हैं.' इस बारे में राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यह अल्‍पसंख्‍यकों और गैर बीजेपी हिंदू वोटरों को अखिलेश का उनके गठबंधन रखने के संकल्‍प का संदेश देने का प्रयास भी हो सकता है. यदि आखिरी समय में चीजें उम्‍मीदों के अनुसार नहीं जाए तो समाजवादी पार्टी मतदाताओं के बीच बीजेपी से लड़ने के वादे के साथ जा सकती.



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