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भवदीप कांग

चार साल. 21 चुनाव. 15 जीत. 19 राज्य. चुनावी रूप से देखें तो एनडीए को बड़ी सफलता हासिल हुई है. लेकिन अन्य मोर्चों पर 2014 की तुलना में बीजेपी की चमक कुछ कम हो गई है.

नरेंद्र मोदी सरकार के चार सालों का मूल्यांकन करने से पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि एनालिस्ट और वोटर मोदी सरकार का आंकलन अलग-अलग मानदंडों के आधार पर करते हैं. एनालिस्ट अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा, डिप्लोमैसी, लेजिस्लेशन आदि बिंदुओं पर फोकस करते हैं तो वोटर सरकार के सामान्य प्रदर्शन के आधार पर फोकस करते हैं कि सरकार के फैसलों से उनकी जिंदगी में क्या बदलाव हुए.

मूल्यांकन का पहला तरीका मूलतः ऑब्जेक्टिव यानी तटस्थ होता है जबकि दूसरा तरीका सब्जेक्टिव यानी व्यक्तिगत अनुभव से प्रभावित होता है. उदाहरण के लिएः ऑब्जेक्टिव रूप से देखें तो नोटबंदी का फैसला एक खराब तरीके से लागू किया गया फैसला था जिसका किसानों, छोटे कारोबारियों और नौकरियों पर काफी असर पड़ा. लेकिन सब्जेक्टिव रूप से देखें तो आम लोगों ने 'देश के विकास में योगदान' की भावना के साथ सारी परेशानियां झेल ली. दिलचस्प यह है कि भले ही देश की जीडीपी बढ़ रही है लेकिन लोगों की उम्मीद घट रही है और 'अच्छे दिन' वॉट्सऐप जोक्स तक सिमटकर रह गया है.

सरकार की उलब्धियों को लेकर एनालिस्ट्स की राय भी अलग-अलग है. जैसे कुछ का मानना है कि डिफेंस, उड़ान और रिटेल क्षेत्रों में एफडीआई को आसान बनाना या हर क्षेत्र में फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट को बढ़ाना अनुचित है तो कुछ इसे उचित करार देते हैं.

एनडीए सरकार के इकोनॉमिक रिफॉर्म्स की बात करें तो गिलास या तो आधा भरा है या आधा खाली है. डीजल की कीमतों को डीरेगुलेट (नियंत्रण मुक्त) किया गया है लेकिन केरोसीन की कीमतों को नहीं. जीएसटी लागू की गई है लेकिन इसमें जरूरी चीजों जैसे फ्यूल और रियल एस्टेट को शामिल नहीं किया गया है.

दिवालियापन कोड बना हुआ है लेकिन इसे सफलता हासिल करने में दो साल का वक्त लग गया. सब्सिडी देने के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की सुविधा तो दी गई लेकिन सब्सिडी रिफॉर्म कहीं नजर नहीं आया. डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में सुधार हुआ है लेकिन टैक्स टेरिरिज्म पर कोई लगाम नहीं है.

यह माना जाता है कि सार्वजनिक बैंकिंग क्षेत्र में सुधार नहीं कर पाना, किसानों की समस्या का समाधान और बेरोजगारी एनडीए सरकार की सबसे बड़ी असफलताओं में शामिल हैं.

वैसे मोदी सरकार ने प्राकृतिक संसाधनों की नीलामी, जन धन योजना, यूपीआई और मोबाइल आधारित ट्रांजैक्शन की दिशा में कुछ जरूरी कदम उठाए हैं जिनका श्रेय वह ले सकती है. वहीं उन्होंने ऐसे क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं जिनकी ज्यादा चर्चा नहीं होती. मसलन यूरिया की नीम कोटिंग, ऊर्जा बचाने वाले बिजली के उपकरणों का निर्माण और प्रचार, अस्पतालों में ऑनलाइन पंजियन और राष्ट्रीय पुरस्कारों का लोकतांत्रिकरण.

फसल बीमा योजना, उज्जवला योजना, ईप्रोक्योरमेंट, दिव्यांगों के लिए यूआईडी, दलितों के लिए वेंचर कैपिटल फंड , स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट और स्वच्छ भारत अभियान ने भी खासी लोकप्रियता बटोरी है.

लेकिन प्रशासनिक रिफॉर्म नहीं होने के चलते जवाबदेही नहीं है. सरकारी कर्मचारियों को बिना किसी काम के सातवें वेतन आयोग का इनाम दे दिया गया.

स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च कम कर दिये गए, किसानों की आय कम हो गई, रुपया दिन पर दिन गिर रहा है और फिस्कल डेफिसिट के टार्गेट बढ़ रहे हैं. प्रकाश जावडेकर के नेतृत्व में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार होना शुरू हुआ है और गंगा भी पूरी तरह साफ नहीं हुई है.

तो ऐसे में वोटर सरकार के प्रदर्शन को कैसे आंकेंगे? इसमें कोई शक नहीं है कि पूरे देश में उम्मीदों क पूरा नहीं होने की निराशा है, यहां तक कि बीजेपी समर्थक भी इससे निराश हैं.

सरकार विरोधी लहर का कितना असर होगा? वह भी तब जब विपक्ष के पास हमले करने का कोई मजबूत आधार नहीं है?

सरकार विरोधी लहर तब उठती है जब जनता को लगता है कि सत्ता पर आसीन लोगों ने अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल किया है. जैसा कि यूपीए 2 में हुआ था. किसी पॉलिसी के फेल होने से सरकार विरोधी लहर नहीं उठती है. ऐसे में यदि कोई बड़ा घोटाला हो जाए तो जनता सरकार को बाहर का रास्ता दिखा सकती है. रिटेल करप्शन हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है और वर्तमान सरकार पर इसका दोष नहीं मढ़ा जा सकता है. लेकिन यदि घोटाला किसी चर्चित चेहरे जुड़ा है तो जनता माफ नहीं करती है. NDA सरकार पर अब तक भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है.

हालांकि कालाधन वापस लाने में असफलता से मोदी सरकार की विश्वसनीयता कम जरूर हुई है. कालेधन को लेकर जांच जारी है लेकिन इससे जुडे़ आरोपी जिन्हें कड़ी से कड़ी सजा देने का वादा मोदी ने किया था वे फरार हैं. विजय माल्या और नीरव मोदी के विदेश भागने की वजह से मोदी सरकार घिरी जरूर लेकिन इन दोनों के घोटलों को पिछली सरकारों की लीगेसी माना जा रहा है.

कानून व्यवस्था बनाए रखने में असफलता भी सरकार विरोधी लहर के लिए फ्यूल का काम करती है. इस मामले में पिछले चार साल सरकार के लिए खासे मुश्किल रहे हैं. गौरक्षक हिंसक हुए, दलितों और अल्पसंख्यकों पर हमले हुए, सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्या की गई और बच्चों से रेप की खबरें हर दूसरे दिन आ रही हैं.

कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है तो ऐसे में यह साफ नहीं है कि इसका असर आम चुनाव में रहेगा या नहीं, या फिर इनटॉलरेंस और देश को बांटने को लेकर विपक्ष का वार कितना घातक साबित होगा.

सकारात्मक पहलू की तरफ देखें तो हम पाएंगे कि एनडीए ने सरकार ने यूनिफॉर्म सिविल कोड की तरफ छोटे कदम बढ़ा दिए हैं और सरकार ने बेटी बचाओ अभियान का जमकर प्रचार भी किया. मोदी सरकार ने जनभागीदारी को बढ़ाने और जनता से सीधा संवाद बनाने के लिए MyGov ऐप शुरू किया और स्मार्ट इंडियन हैकाथॉन जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत की जो कि सराहनीय है.

राजनीतिक रूप से बीजेपी परेशानी में है क्योंकि एनडीए में जो दरारें हैं वे ठीक होने वाली नजर नहीं आती हैं. विपक्ष बीजेपी के खिलाफ एकजुट हो रहा है. मोदी पर केंद्रिय एनडीए सरकार गठबंधन के नियम के अनुकूल नहीं है और इसके चलते विपक्ष की एकता बढ़ रही है. 2019 के आम चुनाव को बीजेपी बनाम अन्य के तौर पर देखा जा रहा है.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ सहयोगी पार्टियां नाखुश हैं. आरएसएस-बीजेपी के अंदर भी मोदी-शाह के फैसलों को लेकर असंतोष है. फैसलों को लेकर पीएमओ-केंद्रित व्यवस्था के चलते कई कैबिनेट मंत्री भी बेचैन हैं. सरकार चलाने में यह एक बड़ी समस्या हो सकती है.

एनडीए बिना अभिमान के आगे बढ़ सकती थी. सरकार बनाने में एनडीए की भूमिका, न्यायिक नियुक्तियों में सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों को कम आंकना, आरबीआई के चर्चित गवर्नर रघुराम राजन को बाहर का रास्ता दिखाना और विपक्ष या कैबिनेट को साधने में असफलता कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो राष्ट्रीय महत्व के हैं.

लेकिन फिर भी हर चुनाव में एनडीए से इतर ब्रांड मोदी को जीत मिली है. प्रधानमंत्री की छवि गरीब और विकास के समर्थकों के रूप में है और वह राष्ट्रवाद के एक बड़े आईकन बन चुके हैं. विपक्ष उन पर जितने हमले करता है वह उतने ही पावरफुल होते जाते हैं.

ऐसे में अंग्रेजी का एक गाना याद आता है जिसके हिंदी में बोल कुछ इस प्रकार हैं,  “पता नहीं इतना प्यार पाने के लिए उसने क्या किया... लेकिन वह कुछ अच्छा ही कर रहा होगा" (Don't know what (he) did to earn a love like this, but baby (he)/Must be doin' something right”.)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यहां व्यक्त की गई राय उनकी व्यक्तिगत राय है.)

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